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“ऐसा आदेश जो कभी नहीं हुआ, जांजगीर के डीईओ अशोक सिन्हा ने शिक्षकों और बच्चों को भेजा मेला घूमने, शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल”

राज्योत्सव में ‘स्टॉल अवलोकन’ के नाम पर शिक्षकों व विद्यार्थियों को भेजने का आदेश — शिक्षण ठप, नियमों की धज्जियां उड़ाईं

“ऐसा आदेश जो कभी नहीं हुआ, जांजगीर के डीईओ अशोक सिन्हा ने शिक्षकों और बच्चों को भेजा मेला घूमने, शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल”

राज्योत्सव में ‘स्टॉल अवलोकन’ के नाम पर शिक्षकों व विद्यार्थियों को भेजने का आदेश, शिक्षण ठप, नियमों की धज्जियां उड़ाईं

जांजगीर-चांपा। जिले के शिक्षा जगत में जिला शिक्षा अधिकारी अशोक सिन्हा का हालिया आदेश सुर्खियों में है। 31 अक्टूबर 2025 को जारी आदेश (क्रमांक 7399/विविध/2025) में सभी हाई एवं हायर सेकेंडरी स्कूलों के शिक्षकों को निर्देशित किया गया है कि वे राज्योत्सव के दौरान विभिन्न विभागों की स्टॉलों का अवलोकन करें। इतना ही नहीं, शिक्षकों के साथ विद्यार्थियों को भी स्टॉलों का निरीक्षण कराने की बात कही गई है।

शिक्षकों और अभिभावकों दोनों का कहना है कि यह आदेश पूरी तरह अनुचित, अव्यवहारिक और नियमों के विरुद्ध है। राज्योत्सव आयोजन में सुरक्षा और भीड़-भाड़ के बीच स्कूली बच्चों को ले जाना न केवल सुरक्षा जोखिम है बल्कि शिक्षण कार्य को बाधित करने वाला कदम भी है। शिक्षक संगठनों ने कहा कि बच्चों को स्कूल से बाहर इस तरह ले जाना विभागीय निर्देशों के खिलाफ है। यह न तो पाठ्यक्रम का हिस्सा है और न ही शैक्षणिक भ्रमण की परिभाषा में आता है। प्रशासनिक दबाव में ऐसा करना बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ है।

जिले में पहले कभी ऐसा आदेश नहीं हुआ, जिसमें शिक्षकों और विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से “मेले में घूमने” के लिए कहा गया हो। शिक्षा विभाग के भीतर भी इस आदेश को लेकर नाराजगी और भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

शिक्षक बोले- यह शिक्षा नहीं, अफसरशाही का तमाशा है। कई शिक्षकों ने कहा कि सरकार एक ओर “गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा” की बात करती है, दूसरी ओर बच्चों और शिक्षकों को स्टॉलों के चक्कर में भेज रही है। स्कूलों की कक्षाएं ठप हो रही हैं, जबकि बच्चों के साथ दुर्घटना की आशंका भी बनी हुई है।

डीईओ अशोक सिन्हा का यह आदेश शिक्षा व्यवस्था पर गहरा सवाल खड़ा करता है। क्या शिक्षा विभाग अब बच्चों को पढ़ाने के बजाय “अवलोकन यात्राओं” में भेजेगा? लोग कह रहे हैं —“ऐसा आदेश तो पहले कभी नहीं हुआ… अब बच्चे भी अफसरों की औपचारिकता का हिस्सा बन गए हैं!”

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