जिला अस्पताल के सलाहकार पर मरीज को परेशान करने, दुर्व्यवहार करने, लापरवाही, फाइल रोकने और अनावश्यक वेरिफिकेशन का आरोप
फाइल गायब बताकर मरीज को भटकाया, सिविल सर्जन के आदेश पर तुरंत मिली फाइल, सलाहकार पर अभद्रता और दबाव बनाने का गंभीर आरोप
जांजगीर-चांपा। जिला अस्पताल जांजगीर से एक गंभीर शिकायत सामने आई है, जिसमें सलाहकार अंकित ताम्रकार पर मरीज के परिजन को परेशान करने, फाइल न देने पर बहाने बनाने, अनावश्यक पुलिस वेरिफिकेशन के नाम पर दबाव डालने और अभद्र व्यवहार करने का आरोप लगाया गया है। इस घटना ने अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली और व्यवहार पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिकायतकर्ता ने कलेक्टर को दिए आवेदन में बताया कि ग्राम भोजपुर निवासी भागवतधारी धीवर 16 नवंबर को भर्ती हुए थे, वहीं 17 नवंबर को स्वेच्छा से छुट्टी लेकर घर चले गए। मरीज की हालत पुनः बिगड़ने पर उनके पुत्र लक्ष्मी धीवर उन्हें 19 नवंबर को जिला अस्पताल लेकर पहुँचे, लेकिन भर्ती फाइल उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर डॉक्टर और नर्सों ने फाइल न मिलने की बात कही।
20 नवंबर को मरीज के पुत्र ने पुनः सलाहकार अंकित ताम्रकार से फाइल उपलब्ध कराने का अनुरोध किया, लेकिन आरोप है कि उन्होंने फाइल देने से पहले अनावश्यक पुलिस वेरिफिकेशन की बात करते हुए आवेदक को उलझाना शुरू कर दिया। आवेदक का कहना है कि सामान्य बातचीत के बाद भी सलाहकार द्वारा जानबूझकर मरीज को परेशान किया गया और फाइल उपलब्ध नहीं कराई गई।
शिकायत में यह भी आरोप है कि जब उन्होंने सिविल सर्जन का नंबर मांगा, तो सलाहकार ने उन्हें अपमानित करते हुए कहा “कहीं भी नहीं मिलेगा” और अभद्र भाषा का प्रयोग किया। इसके बाद आवेदक ने अन्य माध्यम से सिविल सर्जन से संपर्क किया, जिनके निर्देश पर तुरंत मरीज की फाइल उपलब्ध करा दी गई।
आवेदक का कहना है कि यदि सिविल सर्जन के आदेश पर फाइल तत्काल मिल सकती थी, तो सलाहकार द्वारा मरीज को रोका क्यों गया? क्यों पुलिस वेरिफिकेशन जैसे अनावश्यक दबाव बनाए गए? और एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी द्वारा ऐसा व्यवहार कैसे स्वीकार्य हो सकता है?
अवलोकन में यह तथ्य सामने आया कि सलाहकार का यह रवैया न केवल प्रशासनिक लापरवाही दर्शाता है, बल्कि मरीज की स्थिति को नजरअंदाज करते हुए अमानवीय व्यवहार भी साबित होता है।
शिकायतकर्ता ने कलेक्टर से मांग की है कि मामले की जांच कर सलाहकार अंकित ताम्रकार से स्पष्टीकरण लिया जाए और दोषी पाए जाने पर उन्हें उनके पद से हटाकर अन्य कार्य सौंपते हुए कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में मरीजों के साथ ऐसी लापरवाही और दुर्व्यवहार न हो। प्रतिलिपि जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी और सिविल सर्जन को भी भेजी गई है।
यह मामला जिला अस्पताल की सेवाओं और कर्मचारियों के रवैये को लेकर नई बहस छेड़ सकता है।