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जब गुरु ही गंवार निकले…! शिक्षकों को नहीं पता Eleven की स्पेलिंग, न सीएम-कलेक्टर का नाम, नौनिहालों का भविष्य अंधेरे में

शिक्षा व्यवस्था का बदहाल चेहरा, बलरामपुर से शर्मनाक खुलासा, शिक्षा के मंदिर में अज्ञान के पुजारी – जिम्मेदार कौन?

जब गुरु ही गंवार निकले…! शिक्षकों को नहीं पता Eleven की स्पेलिंग, न सीएम-कलेक्टर का नाम, नौनिहालों का भविष्य अंधेरे में

शिक्षा व्यवस्था का बदहाल चेहरा, बलरामपुर से शर्मनाक खुलासा, शिक्षा के मंदिर में अज्ञान के पुजारी – जिम्मेदार कौन?

बलरामपुर। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जो राज्य की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की हकीकत को उजागर करता है। जिले के कुसमी विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत मड़वा के प्राथमिक शाला घोड़ासोत में शिक्षकों की शैक्षणिक अज्ञानता ने पूरे तंत्र को कटघरे में ला खड़ा किया है।

यह कोई दूरस्थ, पहाड़ी या अति पिछड़ा इलाका नहीं, बल्कि वह क्षेत्र है जहां सरकारी स्कूलों को सुधारने के लिए करोड़ों की योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन हकीकत यह है कि यहां के कुछ शिक्षक छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, बलरामपुर कलेक्टर, एसपी और शिक्षा मंत्री का नाम तक नहीं जानते।

हमारे संवाददाता जब स्कूल पहुंचे और शिक्षकों से बच्चों को अंग्रेज़ी में ‘Eleven, Eighteen, Nineteen’ जैसे शब्दों की स्पेलिंग लिखवाने को कहा, तो तीनों शिक्षक गलत उत्तर दे बैठे। एक प्रधानपाठक भी जवाब नहीं दे सका।

वहीं बच्चों से जब देश के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का नाम पूछा गया, तो एक भी सही जवाब नहीं मिला। यह न सिर्फ शिक्षकों की अक्षमता का प्रमाण है, बल्कि इस बात का भी कि बच्चों को न्यूनतम बुनियादी ज्ञान भी नहीं दिया जा रहा।

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि प्रशासन की निगरानी भी पूरी तरह लापरवाह नजर आई। सालों से यहां पढ़ा रहे शिक्षकों की योग्यता पर कभी सवाल नहीं उठे, न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी ने जांच करना ज़रूरी समझा।

जब इस विषय पर बलरामपुर जिला शिक्षा अधिकारी डी.एन. मिश्रा से सवाल किया गया, तो उन्होंने जांच कर कार्यवाही का भरोसा दिया।

लेकिन सवाल यह है कि –

क्या महज़ जांच और आश्वासन से इस घोर लापरवाही का समाधान निकलेगा?

क्या ऐसे शिक्षक योग्य हैं कि वे इन मासूम बच्चों का भविष्य गढ़ सकें?

क्या मुख्यमंत्री, कलेक्टर का नाम तक न जानने वाले शिक्षक बच्चों को भविष्य की मुख्यधारा से जोड़ सकेंगे?

यह सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं, यह उस पूरे सरकारी शिक्षा सिस्टम का आइना है जो दिखावे में शानदार, लेकिन हकीकत में खोखला बन चुका है। सवाल सिर्फ घोड़ासोत की नहीं है, सवाल पूरे प्रदेश की शिक्षा की साख का है।

क्या सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधि अब भी चुप रहेंगे? या फिर शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए कोई सख्त कदम उठाएंगे?

जब गुरु ही अज्ञानी हों, तो शिष्य क्या सीखेंगे?
बलरामपुर के इस शर्मनाक उदाहरण ने साबित कर दिया है कि बच्चों का भविष्य सिर्फ कागज़ों में सुरक्षित है, ज़मीनी हकीकत तो निहायत ही भयावह है।
अब ज़रूरत है – सिर्फ जांच की नहीं, कार्रवाई की… ताकि शिक्षा का मंदिर दोबारा श्रद्धा का केंद्र बन सके, शर्म का नहीं।

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