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माध्यमिक शिक्षा मंडल की चुप्पी में पनप रहा “नकल साम्राज्य”

सक्ति की ऐतिहासिक कन्या विद्यालय में शिक्षा की प्रतिष्ठा धराशायी, अधिकारी मौन

माध्यमिक शिक्षा मंडल की चुप्पी में पनप रहा “नकल साम्राज्य”

सक्ति की ऐतिहासिक कन्या विद्यालय में शिक्षा की प्रतिष्ठा धराशायी, अधिकारी मौन

सक्ति। जिला समन्वय एवं मूल्यांकन केंद्र सक्ती के तहत बोर्ड एवं ओपन बोर्ड परीक्षा में चल रहा नकल का खुला खेल अब इतना बढ़ चुका है कि प्रदेश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कन्या विद्यालयों में शुमार शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सक्ती की साख गंभीर संकट में है। वर्षों से गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की मिसाल रही यह संस्था आज नकल माफिया, प्राचार्य की मनमानी और बोर्ड अधिकारियों की उदासीनता का शिकार हो चुकी है और सिस्टम की नाकामियाँ सामने आने के बाद भी माध्यमिक शिक्षा मंडल के अध्यक्ष व सचिव लगातार मौन हैं।

परीक्षा कक्षों में सामूहिक नकल, उम्रदराज परीक्षार्थियों की धड़ल्ले से एंट्री!

ओपन बोर्ड एवं बोर्ड अवसर परीक्षा के दौरान कई परीक्षा कक्षों में सामूहिक नकल की स्थिति प्रत्यक्ष रूप से देखी गई है।
हायर सेकेंडरी में उम्रदराज परीक्षार्थियों को बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश मिल रहा है और वे नकल सामग्री के साथ परीक्षा दे रहे हैं। केंद्राध्यक्ष (प्राचार्य) द्वारा बोर्ड की गाइडलाइन का पालन न करना और परीक्षकों की कमजोर व्यवस्था इस गम्भीरता को और बढ़ा रही है।

3 घंटे की प्रायोगिक परीक्षा 30 मिनट में खत्म, “स्पीड” पर उठ रहे गंभीर सवाल

परीक्षार्थियों के अनुसार प्रैक्टिकल परीक्षा, जिसे तीन घंटे में होना चाहिए, कई कक्षों में मात्र 30 मिनट में निपटा दी गई।
यह न केवल परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गहरा प्रहार है, बल्कि यह संदेह भी मजबूत करता है कि परीक्षा सिर्फ कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है।

बच्चियों की पढ़ाई चरमराई, उपस्थिति 60% से नीचे, लेकिन किसी को परवाह नहीं!

विद्यालय में नियमित छात्राओं की मासिक औसत उपस्थिति सिर्फ 60% के आसपास है जबकि परीक्षा में बैठने के लिए 75% अनिवार्य है। तीन-तीन बार ओपन बोर्ड परीक्षा लेने से पूरी संस्था की शैक्षणिक दिनचर्या अस्त-व्यस्त है। विषय-शिक्षक सिर्फ कोर्स पूरा करने की औपचारिकता निभाने को विवश हैं और बच्चियों की नियमित पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हो चुकी है।

बड़ा खुलासा: नियमित छात्राएँ भी ओपन बोर्ड परीक्षा में शामिल, नियमों की धज्जियाँ

नियम के अनुसार कोई भी छात्रा एक ही वर्ष में दो बोर्ड परीक्षाओं में शामिल नहीं हो सकती, फिर भी संस्था की प्राचार्य स्वयं नियमित छात्राओं को ओपन बोर्ड परीक्षा में बैठाने को प्रोत्साहित कर रही हैं। सूत्र बताते हैं कि ओपन बोर्ड की अग्रेषण फीस, साल में तीन बार परीक्षा संचालन का पारिश्रमिक और बोर्ड दौरे का टीए-डीए, प्राचार्य के लिए “अतिरिक्त आय” का स्रोत बन चुके हैं। इसका खामियाजा बच्चियों की शिक्षा और विद्यालय की प्रतिष्ठा भुगत रही है।

जर्जर भवन, गिरता प्लास्टर, घायल छात्रा, सुरक्षा भी खतरे में, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं

विद्यालय के तीन कक्ष मरम्मत के बाद भी उपयोग योग्य नहीं हैं। बीते सितंबर में भारी बारिश के दौरान छत से सीमेंट गिरा, जिससे एक छात्रा को चोट भी आई। सोशल मीडिया पर इसकी शिकायत की गई तो आरोप है कि प्राचार्य ने बच्चियों को फटकार लगाकर मामला दबाने का प्रयास किया।

ओपन बोर्ड की किताबें तीन महीने तक बरामदे में पड़ी रहीं

सैकड़ों पुस्तकें महीनों तक बरामदे में सड़ती रहीं। अवसर परीक्षा शुरू होने से दो दिन पहले इन्हें एक जर्जर कक्ष में शिफ्ट किया गया। इस बीच बच्चियाँ बरामदे में पढ़ने को मजबूर रहीं, पर शिक्षा मंडल और स्थानीय अधिकारी आंख मूंदे बैठे रहे।

बाहरी परीक्षक भी असहाय, अनुभवी व्याख्याताओं को क्यों नहीं लगाया गया?

विद्यालय में वर्षों से पढ़ा रहे कई अनुभवी व्याख्याता उपलब्ध हैं, फिर भी केंद्राध्यक्ष ने उनकी ड्यूटी न लगाकर बाहरी परीक्षकों को बुलाया, जो नकल रोक पाने में पूरी तरह विफल रहे। यह निर्णय स्वयं अपने आप में संदेह पैदा करता है कि क्या नकल रोकने की कोई इच्छा थी भी?

विधायक भी उठा चुके मुद्दा, शिक्षा मंडल का ठंडा रवैया प्रश्नों के घेरे में

ओपन बोर्ड केंद्र को अन्यत्र स्थानांतरित करने, मूल्यांकन केंद्र के दौरान ओपन बोर्ड परीक्षा बंद करने और विद्यालय में संसाधन उपलब्ध कराने जैसे मुद्दे बार-बार विधानसभा में उठाए जा चुके हैं, फिर भी शिक्षा मंडल के अध्यक्ष और सचिव ने न सुधारात्मक कदम उठाए, न कोई संज्ञान लिया। उनकी चुप्पी अब संदेहजनक और चिंताजनक दोनों मानी जा रही है।

शीतकालीन सत्र में फिर उठेगा मुद्दा, जनता को जवाब चाहिए

सूत्रों के अनुसार आगामी विधानसभा के शीतकालीन सत्र में इस गंभीर मुद्दे पर एक बार फिर प्रश्न और ध्यानाकर्षण सूचना के माध्यम से सदन का ध्यान आकृष्ट किया जाएगा। अब जिले के अभिभावकों, विद्यार्थी और शिक्षण समुदाय का एक ही सवाल है “माध्यमिक शिक्षा मंडल के अध्यक्ष और सचिव कब जागेंगे? कब नकल पर रोक लगेगी? कब बच्चियों की शिक्षा और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी?”

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