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तालियों की गूंज, भाषणों का शोर… और दिव्यांगों के हिस्से सिर्फ़ ‘सहानुभूति का सर्टिफिकेट’

अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस पर आयोजन, पर सुविधाएं आज भी कागज़ों में

तालियों की गूंज, भाषणों का शोर… और दिव्यांगों के हिस्से सिर्फ़ ‘सहानुभूति का सर्टिफिकेट’

अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस पर आयोजन, पर सुविधाएं आज भी कागज़ों में

 

जांजगीर–चांपा। अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस के अवसर पर जिले के मिनी स्टेडियम पेण्ड्री भांठा में जिला प्रशासन, समाज कल्याण विभाग और समग्र शिक्षा के संयुक्त तत्वावधान में दिव्यांग बच्चों के लिए खेल-कूद, साहित्यिक व सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं तथा सामग्री वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मंच पर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की लंबी कतार, माइक पर बड़े-बड़े शब्द और ज़मीन पर छोटे-छोटे सपने, यही इस समारोह की असली तस्वीर रही।

कार्यक्रम में दौड़, जलेबी दौड़, मटका फोड़, गोला फेंक, सॉफ्ट बॉल थ्रो, मोती अलग करना, रंगोली, चित्रकला, निबंध, भाषण, नृत्य और कविता जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। विजेताओं को मेडल और प्रमाण पत्र देकर पुरस्कृत किया गया और सभी बच्चों को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। समाज कल्याण विभाग की ओर से कुछ दिव्यांगजनों को मोटराइज्ड ट्राइसाइकिल, व्हीलचेयर और बैसाखी भी प्रदान की गई, ताकि “सरकार की संवेदनशीलता” की तस्वीरें पूरी हो सकें।

मंच पर विधायक, पूर्व जनप्रतिनिधि, जिला पंचायत सदस्य, कलेक्टर प्रतिनिधि, समाज कल्याण व शिक्षा विभाग के अधिकारीगण मौजूद रहे। भाषणों में समावेशी शिक्षा, समान अवसर और दिव्यांगों के उज्ज्वल भविष्य की बातें बड़ी आत्मीयता से कही गईं। समस्या बस इतनी रही कि ये सारी बातें अक्सर माइक तक ही सीमित रह गईं, ज़मीनी हकीकत तक नहीं पहुँच पाईं।

सबसे बड़ा कटाक्ष यह रहा कि यह दिवस कहीं “सशक्तिकरण” का कम और “सहानुभूति का वार्षिक पर्व” अधिक प्रतीत हुआ। क्या कारण है कि ऐसे आयोजनों में उन दिव्यांग कर्मचारियों, अधिकारियों और शिक्षकों को आमंत्रित नहीं किया जाता जो विभिन्न विभागों में कार्यरत हैं? अगर उन्हें भी मंच पर बुलाया जाता तो समाज को यह पता चलता कि दिव्यांगता कमजोरी नहीं, बल्कि एक अलग सामर्थ्य है।

कार्यक्रम में उपस्थित बीआरपी (ब्लॉक रिसोर्स पर्सन), जो वर्षभर दिव्यांग बच्चों के साथ नियमित प्रशिक्षण तक नहीं देते, आज अचानक ‘दिव्यांग हितैषी’ भूमिका में नजर आए। अभिभावकों से बातचीत करने पर यह भी सामने आया कि कई दिव्यांग छात्र-छात्राओं को आज तक समय पर छात्रवृत्ति नहीं मिली है। जिन बच्चों के लिए साइन लैंग्वेज और ब्रेल लिपि आवश्यक है, उन्हें सिखाने वाला प्रशिक्षित स्टाफ तक उपलब्ध नहीं है। विडंबना यह है कि जिन लोगों को स्वयं आवश्यक प्रशिक्षण नहीं है, वे कार्यालयों में बैठकर दिव्यांग बच्चों का भविष्य तय कर रहे हैं।

दिव्यांगजन दिवस कोई शुभकामना देने वाला उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन होना चाहिए एक ऐसा दिन जब व्यवस्थाओं की असलियत आईने में दिखाई जाए। सिर्फ एक दिन मंच सजाकर, भाषण देकर और फोटो खिंचवाकर अगर जिम्मेदारियां पूरी हो जातीं, तो आज शायद कोई दिव्यांग खुद को उपेक्षित महसूस नहीं करता।

यह विडंबना ही है कि जहाँ एक ओर स्वयं प्रधानमंत्री “सुगम्य भारत” की बात करते हैं, वहीं जिले का कलेक्टर कार्यालय वर्षों से दिव्यांगों की पहुँच से आज भी दूर बना हुआ है। कार्यालय में बना रैम्प इतना अव्यवहारिक और असुरक्षित है कि कोई भी दिव्यांगजन वहाँ से चढ़कर कलेक्टर तक अपनी बात पहुँचाने का साहस तक नहीं कर सकता। यही हाल मुख्यालय के अनेक राष्ट्रीयकृत बैंकों और अन्य सरकारी कार्यालयों का भी है, जहाँ अगर कोई दिव्यांग व्यक्ति जाना चाहे तो उसकी इच्छा भी दरवाज़े पर ही दम तोड़ देती है। जब जिले का सबसे बड़ा प्रशासनिक कार्यालय ही दिव्यांगों के लिए “असुगम” बना हुआ है, तो बाकी विभागों से संवेदनशीलता और सुविधा की उम्मीद करना महज़ एक औपचारिक उम्मीद बनकर रह जाती है।

आवश्यकता इस बात की है कि 3 दिसम्बर एक “इवेंट” नहीं, बल्कि एक “एजेंडा” बने, जो सालभर की जिम्मेदारी तय करे, केवल एक दिन का तमाशा नहीं। वरना हर साल यही होगा, दिव्यांगजन दिवस आएगा, तालियां बजेंगी, खबर छपेगी… और फिर वही खामोश लाचारी अगले 364 दिन इंतज़ार करेगी।

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