127 दिन की छुट्टी का रहस्य गहराया: 115 दिन की स्वीकृति का दावा, नियमों की अनदेखी पर उठे तीखे सवाल
रायपुर से जारी पत्र ने बढ़ाई उलझन, बिलासपुर कार्यालय को दरकिनार कर अवकाश स्वीकृति पर खड़े हुए गंभीर संदेह
जांजगीर-चांपा। समाज कल्याण विभाग में 127 दिनों के अवकाश और वेतन आहरण का मामला अब और अधिक संदिग्ध और पेचीदा होता जा रहा है। ताजा घटनाक्रम में 23 दिसंबर 2025 को जारी एक पत्र सामने आया है, जिसमें 115 दिनों के अवकाश को स्वीकृत किए जाने का दावा किया गया है। लेकिन इस पत्र ने मामले को सुलझाने के बजाय नए और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, संयुक्त संचालक, समाज कल्याण विभाग रायपुर के पत्र क्रमांक 1346/स्था./स.क्र/2025 में उप संचालक श्रीमती बरखा मिहिर के 115 दिनों के चिकित्सकीय अवकाश को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (अवकाश) नियम 2010 एवं चिकित्सा परिचर्चा नियम 2013 के तहत स्वीकृत बताया गया है। पत्र में यह भी उल्लेख है कि उक्त अवकाश को अर्जित अवकाश में समायोजित किया गया है और इसके बाद भी 95 दिन का अवकाश शेष रहेगा।
जबकि सेवा पुस्तिका में अवकाश का इंद्राज आज दिनांक तक कहीं नहीं है इससे स्पष्ट है कि उक्त पत्र फ़र्ज़ी और फ़र्ज़ी हस्ताक्षर से जारी कर वेतन आहरित किया गया है। ऐसी स्थिति में फ़र्ज़ी हस्ताक्षर को लेकर विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा प्राथमिकी दर्ज (F.I.R.)किया जाना न्यायसंगत होगा ताकि निष्पक्ष जांच हो सके।
लेकिन पूरे मामले में सबसे बड़ा विवाद पत्र के अंत में दर्ज “संचालक महोदय द्वारा अनुमोदित” वाक्य ने खड़ा कर दिया है। प्रश्न यह उठ रहा है कि जब पत्र संयुक्त संचालक द्वारा जारी किया गया, तो क्या वास्तव में संचालक स्तर से विधिवत अनुमोदन हुआ था? यदि हुआ, तो उसका स्वतंत्र आदेश या आधिकारिक दस्तावेज अब तक सामने क्यों नहीं आया?
प्रक्रिया पर बड़ा सवाल: बिलासपुर कार्यालय को क्यों किया गया नजरअंदाज?
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू प्रक्रिया का उल्लंघन माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, संबंधित अधिकारी की पदस्थापना जांजगीर-चांपा जिले में है, जिसका प्रशासनिक नियंत्रण संयुक्त संचालक, बिलासपुर के अधीन आता है।
नियमानुसार—
अवकाश आवेदन पहले संयुक्त संचालक, बिलासपुर कार्यालय में प्रस्तुत होना था
वहां से परीक्षण के बाद संचालक, रायपुर को अनुमोदन हेतु भेजा जाना था
स्वीकृति के पश्चात वेतन आहरण की प्रक्रिया भी उसी प्रशासनिक चैनल से पूरी होती
लेकिन आरोप है कि संबंधित अधिकारी द्वारा अवकाश आवेदन बिलासपुर कार्यालय में प्रस्तुत ही नहीं किया गया। इसके बावजूद सीधे रायपुर स्तर से अवकाश स्वीकृति का दावा किया जाना पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
“कागजों में खेल” या प्रशासनिक चूक?
मामले में एक और चौंकाने वाला पहलू यह है कि इससे पहले अवकाश स्वीकृत नहीं होने संबंधी पत्र भी सामने आ चुके हैं। अब 115 दिनों की स्वीकृति का नया पत्र सामने आने से दस्तावेजों में विरोधाभास साफ नजर आ रहा है। ऐसे में यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही है या फिर सुनियोजित तरीके से नियमों को दरकिनार कर कागजी प्रक्रिया पूरी की गई?
वेतन आहरण पर भी उठे सवाल
यदि अवकाश स्वीकृति की प्रक्रिया ही संदिग्ध है, तो उस अवधि में वेतन आहरण की वैधता भी स्वतः प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। नियमानुसार, विधिवत स्वीकृति और प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद ही वेतन भुगतान किया जा सकता है। ऐसे में बिना वैधानिक प्रक्रिया के वेतन निकासी को लेकर भी जांच की मांग तेज हो रही है।
कार्रवाई में देरी से बढ़ा संदेह
सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक पहलू यह है कि इतने गंभीर आरोपों और दस्तावेजों में स्पष्ट विसंगतियों के बावजूद अब तक संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे प्रशासनिक निष्क्रियता या संरक्षण की आशंका भी व्यक्त की जा रही है।
अब जांच रिपोर्ट पर टिकी नजरें
पूरा मामला फिलहाल कलेक्टर, जांजगीर-चांपा को सौंपा गया है। जांच रिपोर्ट ही यह स्पष्ट करेगी कि
115 दिनों के अवकाश स्वीकृति पत्र की वास्तविकता क्या है
प्रक्रिया का पालन हुआ या नियमों की अनदेखी की गई
127 दिनों के अवकाश और वेतन आहरण के पीछे की सच्चाई क्या है
जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक यह मामला न सिर्फ विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता रहेगा, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गंभीर बहस को जन्म देता रहेगा।