
हसदेव के पुल पर थम गई थीं सैकड़ों सांसें… 29 साल बाद भी जिंदा है चांपा रेल हादसे की टीस
14 सितंबर 1997 की वह शाम… अहमदाबाद-हावड़ा एक्सप्रेस के पांच डिब्बे नदी में समा गए थे | 88 यात्रियों की मौत की रेलवे ने की थी पुष्टि, 350 से अधिक घायल हुए थे
चांपा | विशेष रिपोर्ट
14 सितंबर 1997… चांपा के इतिहास की वह तारीख, जिसे 29 साल बाद भी भुला पाना आसान नहीं है। शाम का वक्त था। अहमदाबाद से हावड़ा की ओर जा रही 3033 डाउन अहमदाबाद-हावड़ा एक्सप्रेस अपने सफर पर थी। यात्रियों से भरी ट्रेन चांपा स्टेशन से करीब एक किलोमीटर आगे हसदेव नदी के पुल पर पहुंची और कुछ ही पलों में एक सामान्य रेल यात्रा देश की बड़ी रेल त्रासदियों में बदल गई।
ट्रेन के पांच डिब्बे पुल से नीचे हसदेव नदी में जा गिरे। किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। देखते ही देखते चीख-पुकार मच गई। नदी के नीचे क्षतिग्रस्त डिब्बे, फंसे यात्री, घायल लोगों की कराह और अपनों की तलाश में घटनास्थल की ओर दौड़ते परिजन—उस शाम का मंजर आज भी चांपा की सामूहिक स्मृति में दर्ज है। पुराने समाचार अभिलेखों के अनुसार हादसा करीब शाम 5:52 बजे हुआ था और ट्रेन उस समय करीब एक घंटा 20 मिनट विलंब से चल रही थी।

एक झटके में बदल गया सफर का अंजाम
ट्रेन के आगे के हिस्से के डिब्बे हादसे की चपेट में आए। पुराने समाचार अभिलेख बताते हैं कि नदी में गिरने वाले डिब्बों में पार्सल वैन से जुड़ा जनरल कोच, स्लीपर और जनरल श्रेणी के डिब्बे शामिल थे। एक कोच पुल पर ही लटक गया था। एक सामान्य डिब्बा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ था और उसमें बड़ी संख्या में यात्री सवार थे। कुछ ही देर में दुर्घटनास्थल पर आसपास के गांवों और चांपा से लोग पहुंचने लगे। प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी राहत-बचाव कार्य में जुट गए। अंधेरा बढ़ने के साथ बचाव अभियान और कठिन होता गया, लेकिन जिंदगी बचाने की कोशिशें रातभर चलती रहीं।
मौत का आंकड़ा बढ़ता गया
हादसे के तत्काल बाद मृतकों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए। शुरुआती समाचारों में करीब 100 यात्रियों के मारे जाने की आशंका जताई गई थी। बाद की रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 77 और 81 तक बताई गई। राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध दुर्घटना अभिलेखों में 81 लोगों की मौत का उल्लेख मिलता है। वहीं स्थानीय प्रकाशित विवरण में रेलवे द्वारा 88 यात्रियों की मौत की आधिकारिक पुष्टि और 350 से अधिक यात्रियों के घायल होने की जानकारी दी गई है। आंकड़ों में अंतर के बावजूद एक बात निर्विवाद है-14 सितंबर 1997 का चांपा रेल हादसा बेहद बड़ी मानवीय त्रासदी थी।

रेल पटरी पर चल रहा था काम, सामने आया सुरक्षा का सवाल
हादसे के बाद दुर्घटना के कारणों को लेकर जांच शुरू हुई। उस समय सामने आई रिपोर्टों में पुल पर रेल लाइन के रखरखाव और मरम्मत कार्य का उल्लेख किया गया था। एक जांच संबंधी विवरण में यह संभावना सामने आई कि पुल के प्रवेश से पहले सावधानी संबंधी संकेत देखकर चालक ने आपात ब्रेक लगाया और अचानक ब्रेक लगने से पीछे के डिब्बे पटरी से उतर गए।
दूसरी ओर रेलवे से जुड़े स्रोतों ने ट्रैक के एक हिस्से के मरम्मत कार्य और सुरक्षा संकेतों की व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। दुर्घटना के बाद रेलवे ने जांच के आदेश दिए थे। उपलब्ध स्थानीय विवरणों में यह भी उल्लेख है कि ट्रैक पर काम के दौरान निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था के तहत डेटोनेटर लगाने की जिम्मेदारी से जुड़े कर्मचारी पर कार्रवाई हुई थी। यानी हादसे के बाद सिर्फ मौतों का हिसाब नहीं हुआ, बल्कि यह सवाल भी सामने आया कि रेलवे ट्रैक पर चल रहे काम के दौरान यात्रियों की सुरक्षा के लिए तय प्रक्रियाओं का कितना पालन हुआ था।
उस रात चांपा में हर चेहरा अपनों को खोज रहा था
हादसे की खबर फैलते ही चांपा और आसपास के क्षेत्रों में बेचैनी फैल गई थी। रेलवे स्टेशन और अस्पतालों में लोगों की भीड़ जुटने लगी। जिनके परिजन उस ट्रेन में सफर कर रहे थे, उनके लिए हर गुजरता पल भारी था। किसी को अपने पिता की चिंता थी, किसी को मां की। कोई भाई को खोज रहा था तो कोई अपने बेटे की खबर के इंतजार में था। घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया और राहत दल क्षतिग्रस्त डिब्बों से यात्रियों को निकालने में जुटे रहे। हसदेव का वह किनारा, जो सामान्य दिनों में शांत रहता था, उस दिन मदद के लिए पहुंचे लोगों, पुलिसकर्मियों, रेलवे कर्मचारियों और परिजनों की भीड़ से भर गया था।
चांपा की स्मृतियों में आज भी दर्ज है वह शाम
29 साल गुजर चुके हैं। उस समय के बच्चे आज बड़े हो चुके हैं। उस दौर के कई प्रत्यक्षदर्शी अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां यादें ही बीते समय की सबसे बड़ी गवाह हैं। लेकिन 14 सितंबर आते ही वह शाम फिर यादों में लौट आती है। हसदेव नदी पर बना वह रेल पुल आज भी ट्रेन की आवाजाही का हिस्सा है। रोज सैकड़ों ट्रेनें यहां से गुजरती हैं। यात्रियों के लिए यह महज एक पुल है, लेकिन चांपा और आसपास के उन लोगों के लिए यह जगह एक ऐसी त्रासदी की गवाह है, जिसे समय भी मिटा नहीं सका।
29 साल बाद भी सवाल से बड़ा है दर्द
रेल हादसे के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठे थे। रेलवे सुरक्षा के नियमों, ट्रैक रखरखाव, सावधानी संकेत और मरम्मत कार्य के दौरान ट्रेनों की सुरक्षित आवाजाही जैसे मुद्दे चर्चा में आए। समय के साथ रेलवे व्यवस्था में तकनीकी और सुरक्षा संबंधी कई बदलाव हुए, लेकिन चांपा की उस त्रासदी की स्मृति आज भी यही याद दिलाती है कि रेल की पटरियों पर छोटी-सी लापरवाही भी सैकड़ों जिंदगियों पर भारी पड़ सकती है।
आज फिर याद आएंगे वे चेहरे…
14 सितंबर 2026 को चांपा उस हादसे की 29वीं बरसी मना रहा है। उन यात्रियों में से अधिकांश के नाम शायद आज की पीढ़ी को मालूम न हों, लेकिन उनके जाने की कहानी चांपा की मिट्टी और हसदेव के पानी में आज भी दर्ज है। उनका सफर भले 14 सितंबर 1997 को खत्म हो गया, लेकिन उनकी स्मृतियां आज भी जिंदा हैं।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि
14 सितंबर 1997 के चांपा रेल हादसे में जान गंवाने वाले सभी यात्रियों को CGKHABARNAMA की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।
29 साल बाद भी हसदेव की लहरों में उस हादसे की टीस महसूस होती है…
और चांपा की स्मृतियों में वह शाम आज भी जिंदा है। 🙏💐— CGKHABARNAMA | विशेष रिपोर्ट




