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लोकसंस्कृति के रंग में रंगा कटघरी, धूमधाम से निकली भव्य भोजली शोभायात्रा

सभी मोहल्लों की रही सहभागिता, सिर पर भोजली लेकर पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुईं महिलाएं; मनका दाई देवालय पहुंचकर विधि-विधान से हुआ विसर्जन

लोकसंस्कृति के रंग में रंगा कटघरी, धूमधाम से निकली भव्य भोजली शोभायात्रा

सभी मोहल्लों की रही सहभागिता, सिर पर भोजली लेकर पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुईं महिलाएं; मनका दाई देवालय पहुंचकर विधि-विधान से हुआ विसर्जन

 

जांजगीर-चांपा। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का जीवंत नजारा ग्राम कटघरी में देखने को मिला। भोजली तिहार के अवसर पर रविवार को गांव में भव्य भोजली शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में गांव के विभिन्न मोहल्लों से बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। पारंपरिक गीत-संगीत और उत्साह के बीच निकली यात्रा से पूरा गांव भोजलीमय नजर आया।

भोजली शोभायात्रा में कंवर पारा, रामगढ़-लिम पारा, यादव मोहल्ला, गोंड पारा तथा गुरु घासीदास मोहल्ला सहित गांव के सभी मोहल्लों के लोगों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता निभाई। ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी से शोभायात्रा का स्वरूप भव्य रहा। महिलाओं ने सिर पर भोजली धारण कर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ यात्रा में हिस्सा लिया। जगह-जगह भोजली तिहार को लेकर लोगों में उत्साह और उमंग दिखाई दी।

मनका दाई देवालय पहुंची शोभायात्रा

भोजली शोभायात्रा गांव के प्रमुख मार्गों से होकर मुख्य तालाब स्थित देवालय मनका दाई पहुंची। यहां पारंपरिक रीति-रिवाजों और विधि-विधान के साथ भोजली का विसर्जन किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे और भोजली की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि तथा अच्छी फसल की कामना की।

कृषि, हरियाली और प्रकृति से जुड़ा लोकपर्व

भोजली तिहार छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं में विशेष स्थान रखता है। यह पर्व कृषि, हरियाली और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना से जुड़ा हुआ है। भोजली के अवसर पर नई टोकरी या पात्र में मिट्टी और खाद डालकर गेहूं अथवा जवारे के दाने बोए जाते हैं। इसके बाद कई दिनों तक भोजली की देखभाल और पूजा-अर्चना की जाती है।

भोजली के पौधों का अच्छी तरह विकसित होना अच्छी फसल, खुशहाली और समृद्धि का शुभ संकेत माना जाता है। ग्रामीण परिवेश में यह पर्व कृषि जीवन और प्रकृति के साथ लोगों के गहरे जुड़ाव को भी दर्शाता है।

मितानी की परंपरा जोड़ती है आत्मीयता के रिश्ते

भोजली तिहार की प्रमुख परंपराओं में मितानी की परंपरा भी शामिल है। भोजली विसर्जन के बाद लोग भोजली की पत्तियों को एक-दूसरे के कान पर लगाकर अथवा आपस में आदान-प्रदान कर आत्मीयता और मित्रता का रिश्ता कायम करते हैं। इस दौरान एक-दूसरे का अभिवादन “सीताराम भोजली” कहकर किया जाता है।

यह परंपरा केवल मित्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक रिश्तों में अपनापन, प्रेम और भाईचारे की भावना को मजबूत करने वाली लोकपरंपरा के रूप में पीढ़ियों से चली आ रही है।

एक साथ नजर आए गांव के सभी मोहल्ले

ग्राम कटघरी में निकली भोजली शोभायात्रा की खास बात गांव के सभी मोहल्लों की सामूहिक सहभागिता रही। अलग-अलग मोहल्लों से आए ग्रामीण एक साथ शोभायात्रा में शामिल हुए। महिलाओं, पुरुषों और ग्रामीणों की सहभागिता से पूरे गांव में उत्सव का माहौल बना रहा।

भोजली तिहार के माध्यम से ग्रामीणों ने अपनी लोकपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश दिया। शोभायात्रा के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक पर्व मनाया।

ग्राम कटघरी में आयोजित भोजली शोभायात्रा ने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की सुंदर तस्वीर प्रस्तुत की। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, अच्छी फसल की कामना, सामाजिक मेल-जोल और आपसी आत्मीयता से जुड़ा यह पर्व ग्रामीणों के लिए उत्सव के साथ-साथ अपनी परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी बना।

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