निजीकरण की आशंका से आकाशवाणी-दूरदर्शन कर्मियों में बढ़ी चिंता, हजारों कर्मचारियों और रिपोर्टरों के भविष्य पर सवाल
प्रसारण सेवाओं में निजी भागीदारी की चर्चा के बीच स्थायी, संविदा और अंशकालिक कर्मियों ने जताई रोजगार सुरक्षा की चिंता

निजीकरण की आशंका से आकाशवाणी-दूरदर्शन कर्मियों में बढ़ी चिंता, हजारों कर्मचारियों और रिपोर्टरों के भविष्य पर सवाल
प्रसारण सेवाओं में निजी भागीदारी की चर्चा के बीच स्थायी, संविदा और अंशकालिक कर्मियों ने जताई रोजगार सुरक्षा की चिंता
नई दिल्ली। देश की सार्वजनिक प्रसारण व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ आकाशवाणी और दूरदर्शन को लेकर निजी भागीदारी अथवा निजी हाथों में संचालन जाने की चर्चाओं ने इन संस्थानों से जुड़े हजारों कर्मचारियों, रिपोर्टरों और अन्य कर्मियों की चिंता बढ़ा दी है। आकाशवाणी और दूरदर्शन लंबे समय से देश के दूरस्थ क्षेत्रों तक सूचना, समाचार, शिक्षा, संस्कृति और मनोरंजन पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं।
आकाशवाणी और दूरदर्शन का संचालन प्रसार भारती के माध्यम से किया जाता है, जबकि प्रसार भारती का संबंध भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से है। ऐसे में सार्वजनिक प्रसारण व्यवस्था में किसी भी बड़े संरचनात्मक बदलाव, निजी भागीदारी या संचालन संबंधी नई नीति को लेकर अंतिम रूप से सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कर्मचारियों से जुड़े हितों, रोजगार सुरक्षा और भविष्य की व्यवस्था पर स्पष्टता सुनिश्चित करने की जवाबदेही भी सरकार और संबंधित मंत्रालय की बनती है।
संस्थानों के भविष्य और संचालन व्यवस्था में संभावित बदलाव को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच कर्मचारियों का कहना है कि यदि निजीकरण या व्यापक स्तर पर निजी हाथों में संचालन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो नियमित कर्मचारियों के साथ-साथ संविदा, आकस्मिक, अंशकालिक और कार्यक्रम आधारित कर्मियों के रोजगार पर भी प्रभाव पड़ सकता है। विशेष रूप से वर्षों से समाचार संकलन, रिपोर्टिंग, कार्यक्रम निर्माण और तकनीकी सेवाओं से जुड़े हजारों लोगों के सामने रोजगार सुरक्षा को लेकर चिंता की स्थिति बन सकती है।
आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़े विभिन्न केंद्रों में कार्यरत रिपोर्टर, उद्घोषक, तकनीकी कर्मचारी, कैमरामैन, संपादकीय कर्मी और अन्य सहयोगी लंबे समय से देशभर में प्रसारण व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाते आ रहे हैं। ग्रामीण और दूरस्थ अंचलों की खबरों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में भी इन संस्थानों के संवाददाताओं और स्थानीय रिपोर्टरों की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है।
कर्मियों का कहना है कि किसी भी प्रकार के संरचनात्मक बदलाव, संचालन में निजी भागीदारी या नई व्यवस्था लागू करने से पहले कार्यरत कर्मचारियों और रिपोर्टरों के हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। रोजगार की निरंतरता, सेवा शर्तों, संविदा कर्मियों की स्थिति और भविष्य की व्यवस्था को लेकर स्पष्ट नीति बनाए जाने की मांग भी उठने लगी है।
सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से स्पष्ट नीति की अपेक्षा
आकाशवाणी और दूरदर्शन भारत की सार्वजनिक प्रसारण पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण संस्थान हैं। ऐसे में इनसे संबंधित किसी भी बड़े बदलाव का सीधा प्रभाव केवल संस्थागत व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि हजारों कर्मचारियों, रिपोर्टरों और उनके परिवारों की आजीविका पर भी पड़ सकता है। इस कारण भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और प्रसार भारती से यह अपेक्षा की जा रही है कि यदि प्रसारण सेवाओं के संचालन या संरचना में किसी प्रकार का बदलाव प्रस्तावित है तो कर्मचारियों के हितों, सेवा सुरक्षा और रोजगार की निरंतरता पर स्पष्ट नीति सार्वजनिक की जाए।
कार्यरत कर्मचारियों और रिपोर्टरों की नजर अब भारत सरकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा प्रसार भारती की आगामी नीतियों और निर्णयों पर टिकी हुई है। निजीकरण अथवा निजी भागीदारी को लेकर जारी चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि वर्षों से सार्वजनिक प्रसारण व्यवस्था से जुड़े हजारों कर्मचारियों और रिपोर्टरों के रोजगार एवं भविष्य की जिम्मेदारी आखिर किस प्रकार सुनिश्चित की जाएगी।




