147 साल पुरानी आस्था का केंद्र तुर्रीधाम, सावन के अंतिम सोमवार को उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
घने जंगल, गाय के बछड़े और राजा लीलाधर के स्वप्न से जुड़ी है शिवधाम की प्राचीन जनश्रुति; गर्भगृह की प्राकृतिक जलधारा आज भी बनी हुई है रहस्य और श्रद्धा का केंद्र

147 साल पुरानी आस्था का केंद्र तुर्रीधाम, सावन के अंतिम सोमवार को उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
घने जंगल, गाय के बछड़े और राजा लीलाधर के स्वप्न से जुड़ी है शिवधाम की प्राचीन जनश्रुति; गर्भगृह की प्राकृतिक जलधारा आज भी बनी हुई है रहस्य और श्रद्धा का केंद्र
सक्ती। सावन के चौथे और अंतिम सोमवार को प्रसिद्ध तुर्रीधाम शिव मंदिर में आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचने लगे। मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र हर-हर महादेव व बोल बम के जयकारों से गूंजता रहा। दूर-दराज के क्षेत्रों के साथ ही अलग-अलग राज्यों से भी श्रद्धालु इस प्राचीन शिवधाम में पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक और पूजन करते नजर आए।
लगभग 147 वर्ष पुरानी मान्यताओं से जुड़े तुर्रीधाम की अपनी एक अलग धार्मिक पहचान है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, आज से करीब 147 वर्ष पहले यह पूरा क्षेत्र घने जंगल के रूप में जाना जाता था। तुर्रीधाम के प्राचीन इतिहास और मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक रोचक जनश्रुति आज भी स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है।

घने जंगल में चरवाहे ने देखा अनोखा दृश्य
मंदिर के पुजारियों ने प्राचीन मान्यताओं के बारे में बताया कि उस समय इस क्षेत्र में एक चरवाहा अपने पशुओं को चराने के लिए जंगल जाया करता था। जनश्रुति के अनुसार, एक दिन उसने देखा कि एक गाय की बछिया एक विशेष स्थान पर जाती थी, जिसके चारों ओर पत्थर रखे हुए थे। बताया जाता है कि जब बछिया उस स्थान पर पहुंचती थी तो उसके थनों से दूध निकलने लगता था।
चरवाहे ने इस घटना को एक-दो नहीं, बल्कि कई बार देखा। अनोखी घटना देखकर उसने गांव पहुंचकर लोगों को इसकी जानकारी दी। हालांकि, उसकी बात पर तत्काल किसी ने विश्वास नहीं किया। लोगों ने इसे असंभव बताते हुए उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। स्थानीय मान्यता के अनुसार, चरवाहा गरीब था और उसकी बात को गांव में अपेक्षित महत्व नहीं मिला।

राजा लीलाधर को आया स्वप्न, फिर बदली कहानी
जनश्रुति के अनुसार, जिस घटना का उल्लेख चरवाहे ने गांव में किया था, उसी से जुड़ा संकेत राजा लीलाधर को रात में स्वप्न के माध्यम से मिला। मान्यता है कि स्वप्न में उन्हें बताया गया कि चरवाहे द्वारा कही गई बात सत्य है। इसके बाद राजा लीलाधर तक उस घटना की जानकारी पहुंची।
पुजारियों के अनुसार, इसके बाद राजा के परिवार ने उस स्थान के धार्मिक महत्व को स्वीकार किया और राजा लीलाधर की दादी ने वहां मंदिर निर्माण की बात कही। इसी के बाद उस पवित्र स्थान पर भगवान शिव के मंदिर की स्थापना की गई। समय के साथ यह स्थान श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बनता चला गया और आज तुर्रीधाम क्षेत्र के प्रमुख शिवधामों में शामिल है।

गर्भगृह की प्राकृतिक जलधारा ने बढ़ाई श्रद्धा
तुर्रीधाम की सबसे विशेष पहचान मंदिर के गर्भगृह से प्राकृतिक रूप से निकलने वाली जलधारा है। शिवलिंग के समीप निरंतर निकलने वाला पानी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का विषय है। मंदिर के पुजारियों का कहना है कि इस जल का स्रोत आखिर कहां है, इसकी स्पष्ट जानकारी आज तक सामने नहीं आ सकी है।
पुजारियों के अनुसार, जलधारा के उद्गम को लेकर वैज्ञानिक स्तर पर भी जानकारी जुटाने का प्रयास किए जाने की बात कही जाती रही है, लेकिन मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार आज भी इसका निश्चित स्रोत ज्ञात नहीं है। श्रद्धालु इस प्राकृतिक जलधारा को भगवान शिव की विशेष कृपा से जोड़ते हैं और इसे पवित्र मानते हैं।
मंदिर के पुजारियों ने बताया कि स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच इस जल को लेकर विशेष धार्मिक विश्वास है। उनका कहना है कि कई श्रद्धालु इस जल का सेवन करने के बाद स्वयं को स्वस्थ और तरोताजा महसूस करने की बात कहते हैं। बुखार सहित विभिन्न शारीरिक परेशानियों से राहत मिलने की भी मान्यता प्रचलित है। यह मान्यता स्थानीय श्रद्धा और धार्मिक विश्वास पर आधारित है।

सावन के हर सोमवार लगता है आस्था का मेला
सावन मास में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है और इसी कारण तुर्रीधाम में सावन के प्रत्येक सोमवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सुबह से ही मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए भक्तों की कतारें लग जाती हैं। हाथों में जल, बेलपत्र और पूजन सामग्री लेकर श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं।
सावन के चौथे और अंतिम सोमवार को भी मंदिर परिसर में भारी भीड़ रही। बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने शिवलिंग के दर्शन किए। आसपास के जिलों के साथ ही अन्य राज्यों से भी पहुंचे भक्तों ने मंदिर में पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की।
श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति से पूरे क्षेत्र में मेले जैसा माहौल बना रहा। धार्मिक वातावरण के बीच जगह-जगह पूजन सामग्री सहित अन्य दुकानों पर भी चहल-पहल देखी गई। मंदिर परिसर में दिनभर शिवभक्ति का माहौल बना रहा।

गौवंश संरक्षण का संदेश लेकर पहुंचे गौभक्त
सावन सोमवार के अवसर पर शिवभक्तों के बीच सक्ती के गौ सम्मान आह्वान अभियान से जुड़े गौभक्त भी पहुंचे। अभियान से जुड़े लोगों ने श्रद्धालुओं से गौवंश संरक्षण के लिए आगे आने की अपील की।
गौभक्तों ने लोगों को गौवंश की हत्या और तस्करी से बचाने के लिए जागरूक किया तथा इस मुहिम से जुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि गौवंश की सुरक्षा और संरक्षण के लिए समाज के सभी वर्गों को जागरूक होकर सहयोग करना चाहिए।
इस तरह सावन के अंतिम सोमवार को तुर्रीधाम में शिवभक्ति के साथ गौसंरक्षण का संदेश भी दिया गया। प्राचीन जनश्रुतियों, प्राकृतिक जलधारा और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के कारण तुर्रीधाम आज भी क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान रखता है।
सावन के चौथे सोमवार पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ ने एक बार फिर यह साबित किया कि तुर्रीधाम की आस्था केवल स्थानीय क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी धार्मिक मान्यताएं दूर-दराज और अन्य राज्यों के श्रद्धालुओं को भी अपनी ओर आकर्षित करती हैं।




